कुबेरनाथ राय से उनके जीवन के बारे में पूछने पर एक बार उन्होंने कहा था- ‘‘मेरे जीवन में कुछ भी ऐसा उग्र, उत्तेजक, रोमांटिक, अद्भुत या विशिष्ट नहीं जो कहने लायक हो। पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक अर्ळ अभावग्रस्त सवर्ण किसान परिवार के शिक्षित और दायित्व-चेतनासम्पन्न युवक की जो नियति होती है, जैसा जीवन होता है, वैसा हमारा भी है। ...ऐसे में अपने जीवन के बारे में कौन सी अनोखी बात बताऊँ? पढ़ा-लिखा, नौकरी की, घर का खर्चा चलाया। अगल से औरों से भिन्न कुछ किया तो ललित निबन्ध लिखा। मैंने क्या लिखा, मेरे ‘अन्तर्यामी पुरूष’ ने लिखवाया। अन्यथा, इस भोजपुरी देहाती से थोड़े ही लिखा जाता।’’ यह बात वे तब कह रहे थे, जब उनका जीवन छठवें दशक के ढलान पर था। सातवें दशक से उसका फासला महज एक-दो साल का रहा होगा। तब तक वे अपने लेखन का ऐसा बहुत कुछ दे चुके थे जो आज भी मूल्यवान है। अब भी उनकी पहचान का एक बड़ा आधार उसी से तय होता है। तब तक ‘कामधेनु’ छप चुकी थी। ‘उत्तरकुरू’ और ‘मराल’ प्रकाशन के क्रम में थे। इनसे पहले के बारह निबन्ध-संग्रह पाठकों के सामने थे। उनकी पहचान तब तक आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी और विद्य...
Rabindranath Tagore का गाजीपुर प्रवास भारतीय साहित्य और पूर्वांचल के सांस्कृतिक इतिहास का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय है। विश्वकवि के रूप में प्रसिद्ध रवींद्रनाथ टैगोर केवल बंगाल के साहित्यकार नहीं थे, बल्कि वे भारतीय चेतना, प्रकृति-प्रेम और मानवीय संवेदनाओं के ऐसे कवि थे, जिनकी दृष्टि सम्पूर्ण भारत को एक सांस्कृतिक सूत्र में बाँधती थी। वर्ष 1888 में उनका गाजीपुर आगमन इसी सांस्कृतिक यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है। लगभग छह महीनों तक गाजीपुर में रहकर उन्होंने न केवल यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता का अनुभव किया, बल्कि अपनी रचनात्मक चेतना को भी एक नया विस्तार दिया। उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशकों में गाजीपुर अपनी प्राकृतिक रमणीयता, गुलाब के बागानों और गंगा तट की शांति के कारण प्रसिद्ध था। उस समय यह नगर अंग्रेजी शासन के अधीन एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक केंद्र भी था। गोराबाजार क्षेत्र में अंग्रेज अधिकारियों और व्यापारियों के बंगले थे, जबकि आसपास का ग्रामीण क्षेत्र अपनी सरल जीवनशैली और हरित वातावरण के लिए जाना जाता था। टैगोर का मन सदैव प्रकृति और एकांत की ओर आकर्षित रहता था। कहा जा...